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शब्द ​वे आखिर कहाँ हैं

मुखड़ा बनें गीत का मेरे या फिर किसी गजल का मतला
शब्द  ​वे आखिर कहाँ हैं, ढूँढता संध्या सकारे 
जो हृदय के तलघरों की भावनायें व्यक्त कर दें स्वर जिसे कह ना सका उस बात में संगीत भर दें कण्ठ की अंगनाई से चल आई देहरी परअधर की एक उस अनुभूति को जो सहज ही अभिव्यक्त कर दें
शब्दकोशों के पलटते पृष्ठ दिन कितने बिताए शब्द आखिर हैं कहाँ वे, कोई तो उनका पता दे
 शब्द जो छाए हुये हर एक भ्रम को काट डालें शब्द देकर अर्थ, अर्थों को कोई नूतन दिशा दें दो दिलों के मध्य की गहरी घनेरी घाटियों का सेतु बन कर बिछ गई ये दूरियां सारी मिटा दें
शब्द ​ ​ आखिर हैं कहाँ वे,जो रहे असि धार बन कर औरनजिनकी आन रखने प्राण हर कोई लुटा दे
शब्द जिनको साथ लेकर्र मेघदूतम नभ विचरते  शब्द बन कर रूप, रम्भा- उर्वशी को चित्र करते शब्द वे  शचि के गिरा जिनसे नहुष नीचे धरा पर  शब्द ​  ​ जिनसे मोरध्वज के पुत्र बिन संकोच कट्ते
आज ​ ​ जो भी सामने हैं, अर्थ खो निष्प्राण वे सब शब्द आखिर हैं कहाँ ,इतिहास जिनको कल पुकारे ​

नए अर्थ दे दू शब्दों को

​अनुमति  अगर तुम्हारी हो तो नए अर्थ दे दू शब्दों कोऔर छंद में उन्हें पिरो कर मैं इक नया गीत लिख डालूँ


बदली की पायल से बिखरी हैं सुर बन कर जो सरगम के
उन्हें कहू मैं चिकुर सिंधु मे छितराये अमोल कुछ मोती
दामिनियों की पेंजनियों से हुई परावर्तित किरणें है उन्हें नाम दूं उस चितवन का ढली साँझ जो चितवित होती
नए कोष के पृष्ठ अभी तो सारे के सारे हैं कोरे
परिभाषा की नई नई परिभाषा से उ​नको रंग डालूँ

चढ़ती हुई रात कीबगिया के सुरमाये से झुरमुट से
तोडू फूल और फिर गूंथू कुछ की वेणी कुछ के गजरे
अम्बर में खींचा करती हैं मन्दाकिनिया जो रांगोली
उसको बना बूटियाँ कर दूं रंग हिनाई ज्यादा गहरे
पुरबा के ​अल्हड झोंके सा लहराता​ यह ​​ गात तुम्हारा अनुमति दो तो भित्तिचित्र कर इसको अपने स्वप्न सजा लूँ
उगी धूपजोओससिक्त ​ पाटलपर करती हैहस्ताक्षर उसको दे विस्तार बना दूँ एक भूमिकानईग़ज़ल की खिड़की के शीशों पर खिंचतीहुई इंद्रधनुषी रेखाएं उन्हें बनाऊं भंगिम स्मितियाँ

यही सोच कर आज

​  संभव है इतिहास आज जो कल फिर वो इतिहास न रहे
संभव है मुस्काते फूलों की पाँखुर में वास न रहे
संभव् है कल छंदों के अनुशासन से कट कर आवारा
घूमे शब्दो की कविता में अलंकार अनुप्रास न रहे

यही सोच कर आज सामने खुले समय के इन पृष्ठों पर
अपने और तुम्हारे संबंधों की गाथा लिख देता हूँ

श्रुतियों में संचित है कितने युग के कितने मन्वंतर के
उगकर ढलते हुए दिवस के पल पल पर घटती घटनाएं
उन्हें प्रकाशित करते करते वाणी करती मूक समर्पण
रह जाती हैं बिना धूप की छुअन किये ही कई ऋचाएं

संभवहै वाणी कल श्रुति की, शब्दों में मुखरित ना होवे यही सोच कर आज उन्हें मैं, अपने शब्द दिये देता हूँ
जगन्नाथ से ले पुरूरवा,

दृष्टियों में बिम्ब

दृष्टियों में बिम्ब भर कर
हम खड़े उस मोड़ पर ही तुम जहां पर एक दिन भुजपाश में आ बंध गए थे
उस जगह परछाइयों के फूल अब भी मुस्कुराते एक पल में ही न जाने वर्ष कितने बीत जाते जागती ​ है भोर अपनी ​सांस में गंधें संजो कर  दिन सुबह से सांझ तक  बस इंद्रधनुषों को बनाते 
चौखटों के  शीर्ष पर तोरण  बने सजते निमिष वे  दृष्टियों की साधना में  जीतते तुम रह गए थे 
दृष्टियों में भर गए है बिम्ब कुछ आकर स्वयं ही जब मेरा सानिध्य पाकर दृष्टि बोझिल हो गई थी उंगलियों ने चुनरी के छोर को आयाम सौंपे और पगनख से धरा पर आकृतियां बन गई थी
कैनवस पर आ क्षितिज के हो रहे जीवंत क्षण वो जब दिशाओ के झरोखे लाज रंजित  हो  गए थे
दृष्टियों में बिम्ब भरने  लग गए हैं आज  फिर से  होंठ की पाँखुर कँपी  थी  चांदनी में भीग कर के  उड़ गया मन, स्यंदनों के   पंख पर चढ़ कर गगन में  पंथ अन्वेषित हुए थे  दो कदम ही साथ चलते 
दृष्टियों में  हो रहा इतिहास फिर से आज बिम्बित प्रीत के किस्से जहां पर स्वर्ण में मढ़ जड़ गए थे

ईद मुबारक

​​उलझन में फंसे शामो सुबह ​ बीत रहे हैँअंधियारे उजालो से लगे जीत रहे हैंझंझाओं के आगोश में लिपटा हुआ है अम्नसुख चैन लगा हो चुके बरसों से यहां  ​दफ्नओढ़े हुए है ख़ौफ़ को नीची हुई नजरजम्हूरियत का कांपता बूढ़ा हुआ शजर​फिर भी किये उम्मीद की शम्मओं  को रोशनरह रह के हुलसता है  जिगर ईद मुबारक​कहती है ये खुशियों की सुबह ईद मुबारक ​


​विस्फोट ही विस्फोट हैं हर सिम्त जहां में रब की नसीहतों के सफे जाने कहाँ है इस्लाम का ले नाम उठाते है जलजलाचाहे है हर एक गांव में बन जाए कर्बला कोशिश है कि रमजान में घोल आ मोहर्रमअब और मलाला नहीं सह पाएगी सितमआज़िज़ हो नफ़रतो से ये कहने लगा है दिलअब और न घुल पाये ज़हर  ईद मुबारककहती है ये  खुशियों की सहर ईद मुबारक


अल कायदा को आज सिखाना है कायदाहम्मास में यदि हम नहीं तो क्या है फायदाकश्मीर में गूंजे चलो अब मीर की गज़लेबोको-हरम का अब कोइ भी नाम तक न लेकाबुल हो या बगदाद हो या मानचेस्टर पेरिस मे न हो खौफ़ की ज़द मे कोइ बशरउतरे फलक से इश्क़ में डूबी जो आ बहे आबे हयात की हो नहर, ईद मुबारक ​कहती है ये खुशियों की सुबह ईद मुबारक

जरा शुभचिंतकों से

है मेरी किसको जरूरत और कितनी
पूछ लेता हूँ जरा शुभचिंतकों से
घिर अपेक्षाओं से अब तक मैं जिया स्वत्व भूला और सब के वास्ते दूसरो के पाँव के कांटे चुने भूल कर अपने स्वयं के रास्ते
कोई मेरे वास्ते क्या झुक सका है पूछ लेता हूँ ये पथ के कंटको स
क्यों भुलावों ​ में​  उलझ जीता रहूँ औ छलूँ में स्वप्न अपने नैन के है अभी आशाये कितनी है जुडी जान लू अपने घड़ीभर चैन  से
कौन से रिश्ते मुझे बांधे हुए है पूछ लेता हूँ मैं बंधू बांधवो से
किसलिए फिर आज भटकाउं नजर खोजते परिचय, अपरिचय में छिपा और पढ़ना चाहूँ एक उस नाम को जो गया ही है नही अब तक लिखा शेष कितने है नयन के बिम्ब बिखर्र पूछ लेता हूँ समय  ​अनुबन्धकों   से 

पितृ दिवस 2017

आद्यशक्ति ने बीजरूप में जिसका प्रादुर्भाव ​किया है
सकल सृष्टि की संरचना में बन कर रहा सदा  ​सहयोगी  ​  शांत रूप में राम, क्रोध में बन जाया करता है शंकर और कृष्ण बन कर जीवन में होता है कर्मो का योगी
आज पुनः उस एक पिता के आगे हो करबद्ध हृदय ये नतमस्तक है ​, और कर रहा   रह रह के सादर अभिनंदन मां की ममता को देता है जीवन मे आयाम नए नित पितृ दिवस पर अर्पित उसको मुट्ठी भर शब्दों का चंदन