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Showing posts from July, 2017

शब्द ​वे आखिर कहाँ हैं

मुखड़ा बनें गीत का मेरे या फिर किसी गजल का मतला
शब्द  ​वे आखिर कहाँ हैं, ढूँढता संध्या सकारे 
जो हृदय के तलघरों की भावनायें व्यक्त कर दें स्वर जिसे कह ना सका उस बात में संगीत भर दें कण्ठ की अंगनाई से चल आई देहरी परअधर की एक उस अनुभूति को जो सहज ही अभिव्यक्त कर दें
शब्दकोशों के पलटते पृष्ठ दिन कितने बिताए शब्द आखिर हैं कहाँ वे, कोई तो उनका पता दे
 शब्द जो छाए हुये हर एक भ्रम को काट डालें शब्द देकर अर्थ, अर्थों को कोई नूतन दिशा दें दो दिलों के मध्य की गहरी घनेरी घाटियों का सेतु बन कर बिछ गई ये दूरियां सारी मिटा दें
शब्द ​ ​ आखिर हैं कहाँ वे,जो रहे असि धार बन कर औरनजिनकी आन रखने प्राण हर कोई लुटा दे
शब्द जिनको साथ लेकर्र मेघदूतम नभ विचरते  शब्द बन कर रूप, रम्भा- उर्वशी को चित्र करते शब्द वे  शचि के गिरा जिनसे नहुष नीचे धरा पर  शब्द ​  ​ जिनसे मोरध्वज के पुत्र बिन संकोच कट्ते
आज ​ ​ जो भी सामने हैं, अर्थ खो निष्प्राण वे सब शब्द आखिर हैं कहाँ ,इतिहास जिनको कल पुकारे ​

नए अर्थ दे दू शब्दों को

​अनुमति  अगर तुम्हारी हो तो नए अर्थ दे दू शब्दों कोऔर छंद में उन्हें पिरो कर मैं इक नया गीत लिख डालूँ


बदली की पायल से बिखरी हैं सुर बन कर जो सरगम के
उन्हें कहू मैं चिकुर सिंधु मे छितराये अमोल कुछ मोती
दामिनियों की पेंजनियों से हुई परावर्तित किरणें है उन्हें नाम दूं उस चितवन का ढली साँझ जो चितवित होती
नए कोष के पृष्ठ अभी तो सारे के सारे हैं कोरे
परिभाषा की नई नई परिभाषा से उ​नको रंग डालूँ

चढ़ती हुई रात कीबगिया के सुरमाये से झुरमुट से
तोडू फूल और फिर गूंथू कुछ की वेणी कुछ के गजरे
अम्बर में खींचा करती हैं मन्दाकिनिया जो रांगोली
उसको बना बूटियाँ कर दूं रंग हिनाई ज्यादा गहरे
पुरबा के ​अल्हड झोंके सा लहराता​ यह ​​ गात तुम्हारा अनुमति दो तो भित्तिचित्र कर इसको अपने स्वप्न सजा लूँ
उगी धूपजोओससिक्त ​ पाटलपर करती हैहस्ताक्षर उसको दे विस्तार बना दूँ एक भूमिकानईग़ज़ल की खिड़की के शीशों पर खिंचतीहुई इंद्रधनुषी रेखाएं उन्हें बनाऊं भंगिम स्मितियाँ

यही सोच कर आज

​  संभव है इतिहास आज जो कल फिर वो इतिहास न रहे
संभव है मुस्काते फूलों की पाँखुर में वास न रहे
संभव् है कल छंदों के अनुशासन से कट कर आवारा
घूमे शब्दो की कविता में अलंकार अनुप्रास न रहे

यही सोच कर आज सामने खुले समय के इन पृष्ठों पर
अपने और तुम्हारे संबंधों की गाथा लिख देता हूँ

श्रुतियों में संचित है कितने युग के कितने मन्वंतर के
उगकर ढलते हुए दिवस के पल पल पर घटती घटनाएं
उन्हें प्रकाशित करते करते वाणी करती मूक समर्पण
रह जाती हैं बिना धूप की छुअन किये ही कई ऋचाएं

संभवहै वाणी कल श्रुति की, शब्दों में मुखरित ना होवे यही सोच कर आज उन्हें मैं, अपने शब्द दिये देता हूँ
जगन्नाथ से ले पुरूरवा,