मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच
की यह सोच का अंतर
तुम्हें मुड़ने नहीं देता
मुझे झुकने नहीं देता

कटे तुम आगतों से
औ विगत से
आज में जीते
वही आदर्श ओढ़े
मूल्य जिनके
आज हैं रीते

विकल्पों की सुलभता को
तुम्हारा दम्भ आड़े आ
कभी चुनने नहीं देता

उठाकर मान्यताओं
की धरोहर
चल रहा हूँ मैं
मिले प्रतिमान विरसे में
उन्हें साँचा  बनाकर
ढल रहा हूँ में

वसीयत में मिला
अनुबंध अगली पीढ़ियों का
राह में रुकने नहीं देता

तुम्हारा  मानना
परिपाटियां
अब हो चुकी खँडहर
मेरी श्रद्धाएँ
संचित डगमगाई
है नहीं पल पर

मेरा विश्ववास दीपित
आस्थाओं की बंधी गठरी
कभी खुलने नहीं देता 

मुझे झुकने नहीं देता


तुम्हारे और मेरे बीच
की यह सोच का अंतर
तुम्हें मुड़ने नहीं देता
मुझे झुकने नहीं देता

कटे तुम आगतों से
औ विगत से
आज में जीते
वही आदर्श ओढ़े
मूल्य जिनके
आज हैं रीते

विकल्पों की सुलभता को
तुम्हारा दम्भ आड़े आ
कभी चुनने नहीं देता

उठाकर मान्यताओं
की धरोहर
चल रहा हूँ मैं
मिले प्रतिमान विरसे में
उन्हें साँचा  बनाकर
ढल रहा हूँ में

वसीयत में मिला
अनुबंध अगली पीढ़ियों का
राह में रुकने नहीं देता

तुम्हारा  मानना
परिपाटियां
अब हो चुकी खँडहर
मेरी श्रद्धाएँ
संचित डगमगाई
है नहीं पल पर

मेरा विश्ववास दीपित
आस्थाओं की बंधी गठरी
कभी खुलने नहीं देता 

हम तुम गए मिल

हम तुम गए मिल

हो गये सुधि के वनों में आज फ़िर जीवन्त वे पल
जब भटकती शाम के इक मोड़ पर हम तुम गये मिल

गोख पर धूमिल क्षितिज की रात आकर झुक रही थी
रोशनी जिस पल प्रतीची की गली में मुड़ रही थी
वर्तिका तत्पर हुईं थीं ज्योति के संग नृत्य करने
और मौसम की थिरक में कुछ खुनक सी घुल रही थी

ज़िन्दगी की इस शिला के लेख बन अविरल अमिट वे
आज फिर अंगनाईयों में फूल बन कर हैं रहे खिल

उस घड़ी ऐसा लगा झंकृत हुई सारी  दिशाएं
वृक्ष की शाखाओं पर नूपुर बजे पुरबाइयों के
सांझ की छिटकी हुई सिंदूरिया परछाइयों में
राग अपने आप गूंजे सैकड़ो शहनाइयों के

ज़िन्दगी की , यूं लगा यायावरी पगडंडियों पर
सामने आ मुस्कुराती पास खुद ही आज मंज़िल

चांदनी तन से छिटक कर लग पड़ी नभ में बिखरने
मलयजी इक गंध उड़ती सांस में भरने लगी थी 
दूधिया चन्दाकिरण भुजपाश में ले गात मेरा
जलतरंगी रागिनी से बात कुछ करने लगी थी

पाँखुरी से कुछ गुलाबो की फसल मंदाकिनी से
धार से अपनी सजाई  प्रीत से भरपूर महफ़िल 

भावना छूने लगी नभ, काँचनजंघा शिखर बन
नयन में नन्दनवानों के राजमहली चित्र उभरे
 बिछ गई कचनार की कलिया  स्वयं आ पगतली में
पारिजाती हो गगन पर कल्पना के स्वप्न संवरे 

समीकरणों की सभी उलझन सहज में ही सुलझ ली
आप ही हल हो गई  आकर रुकी जो पास मुश्किल  

पा गई वरदान कोई सहस्र जन्मों की तपस्या
मिल गया आराध्य जैसे बिन किसी आराधना के
स्वाति के मेघा बरसने लग गये मन चातकी पर
शिल्प में ढलने लगे सब कचित्र आकर कल्पना के

मन निरंतर एक  उस ही ज्वार के आरोह पर है
जब था उमड़ा उन पलो में प्रीत का इक सिंधु फेनिल
राकेश खंडेलवाल
21 नवंबर 2017 

कहनी थी कुछ बात नई

तुम ने भी दुहराई कहनी थी कुछ बात नई 
"अच्छे दिन की आआस लगाए बीते बरस कई"

दिन तो दिन है कब होता है अच्छा और बुरा
कोई कसौटी नही बताये खोटा और खरा
दोष नजर का होता, होते दिन और रात वही
 
अपनी एक असहमति का बस करते विज्ञापन
अनुशासन बिन रामराज्य क्या, क्या तुगलक शासन
मक्खन मिलता तभी दही जब मथती रहै रई 

भोर रेशमी, सांझ मखमली, दोपहरी स्वर्णिम
फागुन में बासंती चूनर सावन में रिमझिम
जितने सुंदर पहले थे दिन अब भी रहै वही 

जानता यह ​तो नही मन

क्या पता कल का सवेराधुंध की चादर लपेटे
या सुनहली धूप के आलिंगनों में जगमगाये
या बरसते नीर में
​ भीगा हुआ हो मस्तियों में ​
जानता यह 
​तो 
 नही मन, किन्तु है सपने सजाये

स्वप्न, अच्छा दिन रहेगा आज के अनुपात में कल
आज का नैराश्य संध्या की  ढलन में ढल सकेगा
आज की पगडंडियां कल राजपथ सी सज सकेंगी
और नव पाथेय पथ के हर कदम पर सज सकेगा

राह में अवरोध बन कर डोलती झंझाये कितनी
और विपदाएं हजारों जाल है अपना बिछाये
नीड का 
​ संदेश कोई 
सांझ ढलती  ला  सकेगी 
जानता यह भी नही मन स्वप्न है फिर भी सजाये 

​उंगलियां जो मुट्ठियों में  थाम कर चलते रहे हैं 
आस की चादर बिछाई जिस गगन के आंगनों में 
धूप के वातायनों तक दौड़ती पगडंडियों पर 
क्या घिरेंगे शुष्क बादल ही बरसते सावनों में 
प्रश्न  उठते हैं निरंतर भोर में, संध्या निशा में
और कोई चिह्न भी न उत्तरों का नजर आये
शून्य है परिणाम में या है अभीप्सित वांछित कुछ
जनता यह भी नहीं मन, स्वप्न है फिर भी सजाये 

कलम से इस हथेली पर


अधूरी रह गई सौगंध, जब तुमने कहा मुझसे
कलम से इस हथेली पर समर्पण त्याग लि
​ख ​
देना

कथानक युग पुराना आज फिर दुहरा दिया तुमने
समर्पित हो अहल्या रह गई अभिशाप से 
​दंशित 

तपा सम्पूर्ण काया को धधकती आग से गुज
​री ​

मगर फिर भी रही 
​वैदेही 
हर अधिकार से वंचित

कहाँ तक न्यायसंगत है कोई अनुबंध इक तरफ़ा
पुराना पृष्ठ फिर इतिहास का इक बार लिख देना

समर्पित हो , रहे हो तुम कभी इतना बताओ तो
पुरंदर तुम, शची का त्याग क्या इक बार पहचाना
पुरू अपने समय के सूर्य थे तुम घोषणा करते
कभी औशीनरी की उर व्यथा के मूल को जाना

चले हम आज जर्जर रीतियाँ सा
​री ​
 बदल डालें
ज़रूरी है ह्रदय पर प्रेम और अनुराग लिख देना

कहो क्या प्रेम आधारित कभी होता है शर्तों 
​पर 
कहाँ मन से मिले मन में उठी हैं त्याग की बातें 
​समर्पण हो गया सम्पूर्ण जब भी प्रेम उपजा है 
गए हैं बँध धुरी  से उस, समूचे दिन, सभी रातें 

कहाँ  जन्मांतर सम्बन्ध होते शब्द में सीमित 
किशन-राधा सती-शिव का उदाहरण आज लिख देना 

कलम से ज़िंदगी में इक महकता बाग़ लिख देना 

जरा झलक मिल जाये

जरा झलक मिल जाये कमल वासिनी की
यही आस ले पूजा की उपवास किये
अभिलाषा के बीज बोये नित सपनो में
और जलाकर दीवाली के रखे दिए 

सुबह आस की भर कर रखी प्यालियां ले
ज्योतिषियों के सम्मुख रखा हथेली को
हाथों की रेखा का मेल नक्षत्रों से
वह करवा दे तो फिर सुख की रैली हो 
दादी नानी से सुन रखा बचपन  में
घूरे के भी दिन फिर जाते बरसों में
तो संभावित। है अपना भी भाग्य खुले
आज नही तो कल या शायद परसों में  

एक सवा मुद्रा का भोग लगाया नित
सवा मनी फल का मन मे आभास लिए
बीज बोये अभिलाषा के नग्नाई में
और दीवाली जैसे दीपित किये दिये

 देते रहे दिलासा मन ही मन खुद को
सदा विगत के कर्मो का फल मिलता है
परे नील नभ के दूजे इक  अम्बर से
इस जीवन को कोई नियंत्रित करता है 
उसे रिझाने को रोजाना मंदिर जा 
सुबह शाम जा आरतियों को गाते   हैं 
एवज़ में पा जाएंगे हम झलक ज़रा  
छोटी सी बस इक यह आस लगाते हैं 

माला के मनकों पर गिन गिन  कर हमने 
पूरे आठ और सौ मंत्रोच्चार किये 
ज़रा खनक मिल जाए स्वर्ण कंगनों की 
सांझ सवेरे सपनों का विस्तार किये 


जर्जर हुई मान्यता अंधी श्रद्धाएं
गई पिलाई हमें घुटी में बचपन की
कर्महीन होकर भी इन राहों पर चल
मिल जाया करती चौथाई छप्पन की
रहे बांधते दरगाहों पर बरगद पर
 रंगबिरंगे धागे हम मन्नत वाले
और चढ़ाते रहे नीर शिव मंदिर में
बहैं गगन से देव कृपा के परनाले

आधी उमर गंवा कर आंख खुली अपनी
हम मरीचिकाओं में कितने वर्ष जिये
जरा झलक मिल जाती हमें सत्यता की
संभव था बेकार न इतने बरस किये 

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...