मेरी अंगनाई भी हो गयी सन्दली

आपके कुन्तलों की गली से चला
एक झोंका हवा का मचलता हुआ
मेरी दहलीज का जो सिरा छू   गया
द्वार अंगनाई सब हो गये संदली
 
झूम कचनार फिर मुस्कुराने लगी
और गेंदा पलाशों सरीखा हुआ
चम्पा जूही से रह रह लगी पूछने
बेला दिन में है महका, कहो क्या हुआ
रंग ओढ़े गुलाबी चमेली खड़ी
नरगिसी फूल भी लग गये झूमने
मोगरा, मोतिये की पकड़ उंगलियां
आप अपनी हथेली लगा चूमने
 
पूरा मधुबन गली में उतर आ गया
बाग में और भी मच गई खलबली
 
इक लहर धार को छोड़कर तीर पर
आ गई प्रश्न लेकर नयन में नये
पारसी स्पर्श कैसे मिला है इसे
वैसे झोंके यहां से हजारों गये
आपका नाम लिक्खा हुआ पढ़ लिया
तो स्वयं जलतरंगें बजाने लगी
तीर पर दूब भी लग गई झूमने
ताल देती हुई गुनगुनाने लगी
 
नाव पतवार से बात करने लगी
क्यों फ़िजा में घुली मिश्रियों की डली
 
राह चलती ठिठक कर खड़ी हो गई
मोड़ से लौट आई पुन: द्वार पर
मौसमों की शरारत का कोई जिकर
था हुआ ही नहीं आज अख बार पर
आपका चित्र देखा हवा पर बना
बादलों से कहा साथ उसके चलें
बून्द से नाम अंकित करें आपका
रश्मियां पूर्व इसके क्षितिज में ढलें
 
एक पल में लगा पूर्ण वह हो गई
आस जो थी ह्रदय में युगों की पली

No comments:

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...